जब इस खेल मे कोई हार जाता है,सारा मंज़र अजनबी हो जाता है
जो था कभी ताजमहल आज वो महज एक मकबरा नज़र आता है
सब कुछ तो था साफ मगर क्यो अंजान थे हम
देखते है हम जो सपने हर बार वही क्यो बिखर जाता है !
कहते है वो हम अब भी अज़ीज है ,बस वो नही करीब है
हो गई हद बेरूख़ी की आज की वो कहते है हम बे नसीब है.
हमने तो देखा था साथ उनके ही मुक़द्दर अपना
अब माँगे क्या दुआ हम जो संग अपने नही अपना मुरीद है !
करो ना कारोबार इन सपनो का, सकूँन बे मोल बिक जाता है
लूटता है सारे राह मुसाफिर मज़िल भी कही छूट जाता जाता है
जानते है सब कुछ हम भी लेकिन
फ़ितरातन दिल की है, एक बार फिर से तबा होने मे क्या जाता है !
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