Thursday, September 15, 2011


कही तुम रूठे तो नही

रात आए ना जो तुम मेरे दर पे

फिर कितना तन्हा था सहर मेरा

मुक़मल तो थी रात
आधा ही रहा चाँद पूनम पे भी ,

घुल गया था वो भी बन के हम सफ़र मेरा !

असमा तो वही था साथ तारों की महफ़िल नही थी
गिरी हुई ओष की बूँद मे वो झिलमिल नही थी
वो क्या बेरूख़ी थी चादानी की भी
किया ना रोशन जो घर मेरा !